Sunday, August 3, 2008

मानसिक दक्षता - राजेन्द्र बिहारी लाल जी का एकप्रयास

संसार में सुख, सफलता और समृद्धि पाने के लिये मानसिक बल और कार्य-क्षमता की आवश्यकता होती हैं । आर्थिक, व्यावसायिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में उन्नति उन्हीं जातियों ने की है,जिन्होने समुचित शिक्षा द्वारा अपने सदस्यों की मानसिक दक्षता बड़ी ऊँची कोटितक बढ़ा ली है । मानसिक दक्षता केवल भौतिक और आर्थिक क्षेत्रों में ही नहीं, वरं धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों के लिये भी अत्यन्त आवश्यक है । एक निपुण मन ही आत्मा का सबसे बड़ा सेवक और सहायक है । जिन्हे परमात्मा के सच्चे स्वरुप को जानने की उत्कण्ठा है, उन्हे भी इस अनुचर को ना भूलना चाहिये । एक सुशिक्षित और परिष्कृत मन के बिना जहाँ मनुष्य - जीवन का कारोबार नहीं चल सकता, वहाँ आत्मा का विकास भी नहीं हो सकता । जानवरों, बालकों या अल्प बुद्धि वाले मनुष्यों से यह कैसे आशा की जा सकती है कि वे धर्म के सूक्ष्म तत्वों को समझ सकेंगे या अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर हो सकेंगे ? इसी प्रकार यदि कर्मयोग का अर्थ है अपने -अपने कर्तव्य का पालन करके कर्म-फल को भगवान को अर्पण करना, तो क्या साधक के लिये यही उचित है कि भागवान के चरणॊं में बुरी तरह से या बे-परवाही से किया हुआ और त्रुटियों से भरा हुआ कर्म अर्पण करे ? इसके विपरित, कर्मयोग का सच्चा अर्थ तो यह है कि कार्य-कुशलता से अर्थात वैज्ञानिक प्रणाली से किया जाय । एक फूहड़ मनुष्य न तो ब्रह्मज्ञान का अधिकारी बन सकता है और न अपने दैनिक जीवन के कार्यों का समुचित ढंग से सम्पादन कर सकता है । हर दृष्टिकोण से प्रत्येक नर-नारी का यह परम कर्तव्य है कि मस्तिष्क की शक्तियों का उचित विकास और वैज्ञानिक ढंग से सदुपयोग करके अपनी मानसिक क्षमता को यथा सम्भव बढ़ाये ।

इस विषयपर मनोविज्ञानाचार्य बड़ा अनुसंधान कर रहे हैं । यधपि उन्हें अभी तक किसी ऐसी तरकीब का पता नहीं चला है जिससे जन्मजात बुद्दिकी मात्रा में वृद्धि की जा सके, पर उन्होंने ऐसी अनेक बातें खोज निकाली हैं जिनके करने से कोई भी व्यक्ति अपने मस्तिष्क की योग्यता बढ़ा सकता है ।